नाराजगी बढ़ गयी इतनी भी कैसे ?
खुद से ही कितनी दूर बैठे हैं ।
खुदाई मिल गयी ऐसी भी क्या?
खुदा की रहमतों से महरूम बैठे हैं ।
समझ हो गयी इतनी हमें कब ?
नादानियों में साजिशों को ढूंढ बैठे हैं ।
कब भीड़ हो गयी हमारे पास इतनी ?
दोस्तों की महफ़िलों से दूर बैठे हैं ।
कब बना गए हम उसूल इतने ?
प्यार के चंद उसूलों को तोड़ बैठे हैं ।
माटी सी महकती दोस्ती के एहसासों के
घरोंदों थे ,
नाराजगी के तूफ़ान से सब घरोंदों को तोड़ बैठे हैं।
खुदाई मिल गयी ऐसी हमें क्या?
खुदा की रहमतों से महरूम बैठे हैँ ।
खुद से ही कितनी दूर बैठे हैं ।
खुदाई मिल गयी ऐसी भी क्या?
खुदा की रहमतों से महरूम बैठे हैं ।
समझ हो गयी इतनी हमें कब ?
नादानियों में साजिशों को ढूंढ बैठे हैं ।
कब भीड़ हो गयी हमारे पास इतनी ?
दोस्तों की महफ़िलों से दूर बैठे हैं ।
कब बना गए हम उसूल इतने ?
प्यार के चंद उसूलों को तोड़ बैठे हैं ।
माटी सी महकती दोस्ती के एहसासों के
घरोंदों थे ,
नाराजगी के तूफ़ान से सब घरोंदों को तोड़ बैठे हैं।
खुदाई मिल गयी ऐसी हमें क्या?
खुदा की रहमतों से महरूम बैठे हैँ ।
