Saturday, 30 April 2016

श्रमिक दिवस पर विशेष

पसीने से भीगा रहता है तन ..रोता बिलखता रहता है उस माँ का बच्चा जो ईटों का बोझ सर पर उठाती है । हर रोज जर्जर होता है उसका शरीर जो जर्जर इमारतों को दिन रात दुरुस्त करने में लगा रहता है ।किताबों को पकड़ने के लिए बने नाजुक हाँथ ईटों के भारी बोझ को उठाने में जैसे सक्षम से हो जाते हैं । ये दास्तां है कामगारों की ..जी वही कामगार जिनकी एक बड़ी संख्या है इस दुनिया में जिन्होंने अपने हांथों से बनाया है भूत भविष्य और वर्तमान के चेहरे को । जो निर्माता होता है ..नींव की ईट बन जाता है ..जो आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं ।
मई दिवस को हर साल मनाने का प्रस्ताव सन् 1889 में पेरिस में हुई एक मीटिंग में रेमण्ड लेविगन ने रखा था सर्वप्रथम उन्होंने ही शिकागो में हुए जनांदोलन को प्रत्येक वर्ष अंतराष्ट्रीय स्तर पर मनाये जाने की आवश्यकता को महसूस किया था । उसके बाद सन् 1891 में द्वितीय अंतराष्ट्रीय कांग्रेस में इसे औपचारिक पहचान मिली ।
सन् 1904 में एम्स्टर्डम में इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांफ्रेंस आयोजित की गयी जिसमे  सभी देशों के समाजवादी प्रजातात्रिक संस्थाओं , मजदूर संगठनों को  आमन्त्रित किया गया । इस कांफ्रेंस काम के  घण्टों को क़ानूनी तौर पर 8 घण्टे करने का प्रावधान किया गया और मई दिवस के दिन कार्य स्थगन को सम्मिलित देशों में अनिवार्य किया गया।  आज विश्व के 80 देश इस दिन को मनाते हैं । भारत में सर्वप्रथम सन् 1923 में चेन्नई से इस दिवस को मनाने की शुरुआत हुई और आज पूरे भारत में इस दिवस को मनाया जाता है ।
  श्रमिक श्रम करने वाला हर व्यक्ति है । हर श्रमिक को अपने कर्तव्यों को निभाते हुए अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा । उठ खड़े होना अपने शोषण के खिलाफ जंग में ..वो हाँथ जिनमे ताकत है एक इमारत को खड़ा कर देने कि वो हाँथ किसी से अपने अधिकारों की भीख क्यों मांगेगे भला ।

उठो हिला दो तुम नींव को शोषण की ,
तुम श्रमिक हो , निर्माता हो ,
तुम्ही भूत भविष्य के निर्माता हो ।
तेरे हांथों की ताकत से ,
नई सुबह रस्ता पाती है ..
तुम याचक नहीं तुम सैनिक बनो ,
अधिकारों के संरक्षक बनो ।।

#शालिनी