आसूंओं के बादलों में ,
गिरते पड़ते तुफानों से हम गुजरते जायेंगे ,
मुश्किलें कठिनईयां राहों
कि बेड़ियाँ हैं जो ,
मंजिल तक पहुंचेंगे हम तो
मालाओं में बदल जाएँगी ।
चिंगारियां है दिलों में
अभी वो आग में बदल जाएँगी ,
राह की ये ठंडी हवा से और
बढती जायेगी ।
कुछ आवाजें जो बढती है अभी
तोड़ने हौसलों को ,
ये आवाजें ही हमारी विजय
ध्वजा के गान को दोहराएंगी ।
शूल बनके है बीचे राहों में
जो पत्थर अभी .
शहीदों के स्मारको में वो
शिला बन जायेंगे..।
लिखी जायेगी अपनी संघर्ष की
दास्ताँ वहां ,
सुनके , पढके जिसको कभी ...
कुछ लोग प्रेरणा पाएंगे.।
हम न रहेंगे फिर जहाँ में
पर हम सैकड़ों हो जायेंगे..।।


acha h :)
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