लोक चक्षु
Thursday, 18 December 2014
पेशावर की निंदनीय घटना पर प्रतिक्रिया स्वरूप ये पंक्तियाँ
आज अपने ही लहू से सनी हैं अंगुलियाँ।
ये कुछ नही बस कांच के टुकड़े उठाने की सजा है !
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