Sunday, 27 September 2015

लफ्जों की रवानगी की बातें करते है ,
सच्ची बातें ये लोग सुन नहीं सकते ।
ये वहां बगवात की पैरवी करते हैँ ,
ये लोग ही बग़ावत को ख़ाक करते है ।।
वो मिटी है जो दास्ताँ कागज से ,
वो इनायत है इनकी ही ...
इनसे पूछो की कितनी कलमें तोड़ी है ?
कितने अखबार जलाये हैं?
क्योंकि वो दास्ताँ है जो सच्चाई की 
उनमें इनकी सूरतें भी साफ दिखती हैं ।।





Wednesday, 9 September 2015

तन्हा ...

खामोशियों की दुनिया से मुझे बुला कर शोर दे गया ।
मेरी आदतो को बदल कर मुझे तन्हा छोड़ गया ।।
ख़्वाबों की दुनिया से हकीकत में बुला कर नए ख्वाब दे गया ।
फिर तोड़के ख़्वाबों को मुझे अधूरा छोड़ गया ।।
हक़ ले गया मुझसे वो मेरे सारे ..और 
मुझे हकीकत के इन पतथरों के बीच छोड़ गया।।