Sunday, 20 September 2020

जलती रही वो...

जलती रही अंधेरी कोठरियों में वो,

मिटाती रही अंधेरा।

कालिख लगती रही उस पर,

करती रही वो रौशन घर बार।

होती रही जर्जर और

बढ़ती रही अंत की तरफ,

करती रही कोशिश कि चमकने लगे दुनिया,

लेकिन खत्म होता रहा तेल उसी चिराग का।

कभी कभी लगा कि खत्म हो जायेगी,

आंधियों से लड़ने में लगा दी फिर पूरी ताकत कभी,

और जली ऐसे जैसे धधक उठे कोई,

हो जब स्वाभिमान की लड़ाई।

कभी जली बनाने को काजल,

कभी रात का श्रृंगार हो गई,

कभी मृत्यु का शोक,

कभी पूजा की जोत हो गई।

कभी हुई शमा परवाने की,

कभी किसी की दोस्त हो गई।


- शालिनी

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