तुम्हारे उसूलों के पत्थर ,
चुभ रहें हैं अब पांव में ।
टूट रहा घरौंदा ख्वाब का,
इस दुनिया के रिवाज से ।
पूछ रही है सांस ये ,
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
कब तक रहेगी ये गुलामी ,
इस दोहरी सोच के ,
नकाब में बाजार में ।
घुट रहा हर कोई है ,
उलझनों के दोहराव में ।
पूछ रही है सांस ये ,
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
चुभ रहें हैं अब पांव में ।
टूट रहा घरौंदा ख्वाब का,
इस दुनिया के रिवाज से ।
पूछ रही है सांस ये ,
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
कब तक रहेगी ये गुलामी ,
इस दोहरी सोच के ,
नकाब में बाजार में ।
घुट रहा हर कोई है ,
उलझनों के दोहराव में ।
पूछ रही है सांस ये ,
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
क्यों जिंदा हूँ इस हाल में ।
No comments:
Post a Comment