Sunday, 20 September 2020

जलती रही वो...

जलती रही अंधेरी कोठरियों में वो,

मिटाती रही अंधेरा।

कालिख लगती रही उस पर,

करती रही वो रौशन घर बार।

होती रही जर्जर और

बढ़ती रही अंत की तरफ,

करती रही कोशिश कि चमकने लगे दुनिया,

लेकिन खत्म होता रहा तेल उसी चिराग का।

कभी कभी लगा कि खत्म हो जायेगी,

आंधियों से लड़ने में लगा दी फिर पूरी ताकत कभी,

और जली ऐसे जैसे धधक उठे कोई,

हो जब स्वाभिमान की लड़ाई।

कभी जली बनाने को काजल,

कभी रात का श्रृंगार हो गई,

कभी मृत्यु का शोक,

कभी पूजा की जोत हो गई।

कभी हुई शमा परवाने की,

कभी किसी की दोस्त हो गई।


- शालिनी

Monday, 3 April 2017

सम्भल जाओ ..

जरा झुका भी लो ये पलकें 
कि जज्बात न जाहिर हो जायें।
लगा लो परदे खामोशी के,
लफ्ज़ न छलक आयें कहीं।
जरा भी सुनना नहीं किसी की बातें,
कहीं अश्क न छलक जायें कहीं ।
समेट लो खुद को फिर से तुम ,
कहीं फिर से बिखर न जाओ यहीं ।
जरा ओढ़ लो फिर से वही झूठी हंसी,
कि फिर मजाक न बन जाओ कहीं ।
नजर हटा भी लो आइनों से अब,
कि दूर जाकर जरा सम्भल जाओ कहीं।।

Thursday, 16 March 2017

होली हो नहीं पाई !!

होली तो हो ली लेकिन एक बात जो इस बार की होली में मैंने जानने की कोशिश की वो बात जान के लगा की होली तो हो नहीं पाई कुछ लोगों की .. बताते हैं किसकी नहीं हो पाई. होली में बहुत लोग मिलते हैं, बातें भी होती हैं और उन्हीं बातों से कुछ बात निकलती हैं, जो समाज के एक ऐसे सच को लाकर सामने खड़ा देती है जिसे हम सब जानते हैं बस उससे नजरें चुराकर घूमते हैं. शहरों में होने वाली बीहड़ होली के बारे में तो आपने सुना ही होगा वहीं गाँव में होने वाली होली के हुडदंग से भी वाकिफ होंगे . इन्हीं जगहों में बसने वाले सूरज, रोहित और मोहन चच्चा ने खूब होली खेली होली में सड़कों पर बेधडक घूमे, बालों में कोई मलिंगा वाले बाल लगाए कोई बड़ी सुनहरी टोपी लगाये तो कोई सिल्वर वाला केमिकल पोतकर घूमा. ये लोग बिना किसी डर के ही घूमेंगे होंगे न .. उन्हें ये डर नहीं था की भाई कोई घूरने लगेगा कोई अगली गली में उन्हें छेड़ देगा या सामने आता देख कोई शराबी उनसे बदतमीजी करने लगेगा .. उनको आता देख शराबी जो पूरी तरह नशे में डूबा है उन्हें आराम से जाने देगा भला कोई उन्हें क्यों छेड़ेगा .. टोलियों में घूमने वाले लडकों के ये झुण्ड बिलकुल वैसे घूमते हैं जैसे आजादी का हर हक़ उन्हें पैदा होते ही मिल गया था ..खैर आज़ादी तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ही .अब बात वो वाली जिसको हम सब कोई बात नहीं मानते. अब आप ही बताइए होली वाले दिन बाहर यानी सडकों चौराहों का माहौल खराब नहीं होता है .. लड़कियों के लिए ? अब किसी लड़की का घर के बाहर अपने दोस्तों के घर होली खेलने जाने का मन हो तो उसको आप क्या क्या समझायेंगे?
चलिए छोडिये नहीं जाती घूमने, मान  लीजिये की एक लड़की को होली खेले जाने वाले दिन यानी दुलहड़ी वाले दिन ऑफिस जाना पड़ जाये तो भी दिक्कत क्योंकि भैया हमारे तो गाने भी यही कहते हैं .. जो जी में आये आज कर लो जिसको चाहे इन बाहों में भर लो . अब गाने भी यही बज रहे हैं माहौल भी यही कह रहा है और हमारी तो परम्परा ही ऐसी रही है अब उस दिन गलती तो निकलने वाले लड़की की ही मानी जाएगी अगर उसकी कपडे फाड़ दिए जाए या और कुछ बड़ी घटना हो जाये तो.. क्यों ??
अब होली के दिन संस्कार और नारी सम्मान वाली बड़ी बड़ी बातें कौन करता है कोई उसूल याद रह जाता है .. सिग्नल पर तीन दोस्त बिना हेलमेट एक बाइक पर चढे लहराते हुए निकल जाते हैं . जल संरक्षण के बड़े बड़े निबंध लिखने वाला  गोलू छत की टंकी में रंग घोलकर बाल्टी बाल्टी पानी में रंग भर कर गली से निकलने वालों पर डालता जाता है. छत की खिड़की से झांकती रोली लड़कों के हुडदंग को देखकर खुश होती है और सोचती है की काश मैं भी ऐसे अपने दोस्तों के घर रंग खेलने जा पाती .. मौहल्ले की भाभी जिनको रंग बिलकुल पसंद नहीं है, उनकी आज पहली होली है ससुराल में तो देवर मिल कर रंग से भिगो देते है अभी कालेज जाने वाली भाभी रो देती है लेकिन देवरो को खुश देखकर मुस्कुरा देती है वैसे भी मौहलले के इन देवरो ने देवर का फ़रज आज पहली बार निभाया था. अब समझदार तो आप सब हैं ही तो अब जरा सोचियेगा कि रोली के बारे में और होली हो ली कि नहीं?? 

http://havabaazi.com/cafe-diary/holi-ho-naa-pai/


Tuesday, 14 February 2017

हौसलों के घरोंदे

हजारों किस्से लबों पर आकर रुक से जाते हैं,
दिलों के हाल कभी ख़बरों में नहीं आते !
कई बार टूटते  हैं हौसलों के ये घरोंदे ,
इन्हें हर बार मजबूत आसरे नहीं मिलते !

Wednesday, 1 February 2017

सबक

कभी रौशनी गुम हो सी जाती है ,
कभी आग सी अंदर ,
लग सी जाती है ।
उसूलों की सारी बात,
बेमानी सी लगती है ।
बात ईमान की अक्सर ,
चोट कर ही जाती है ।
बहुत सारे सबक हमने
मसीहों से सीखे थे ।
मगर ठोकर से जो सीखे ,
वो रट सी जाती है ।

पहचान

अग्निपथ पर ठहरा हुआ हो वक्त 
और मुस्कुरा दो तुम .... 
हो रास्ता सुनसान सा 
और शोर हो तुझ में  
अंधकार हो घनघोर सा 
और खुद को बुझा दो तुम
जलने की आरजू हो तुझमें
और अक्स को दफना दो तुम ।
जब पूछता हो हर मंजर 
है क्या पहचान तेरी 
अंधकार से संघर्ष में 
खुद को जला दो तुम ।।

Tuesday, 31 January 2017

तस्वीर

लफ्ज़ों की गर्म रजाई में कुछ ख्वाब समेटे रखते हैं ,
हम यादों की तकिया के नीचे तस्वीर छिपाये रखते हैं ।