Monday, 3 April 2017

सम्भल जाओ ..

जरा झुका भी लो ये पलकें 
कि जज्बात न जाहिर हो जायें।
लगा लो परदे खामोशी के,
लफ्ज़ न छलक आयें कहीं।
जरा भी सुनना नहीं किसी की बातें,
कहीं अश्क न छलक जायें कहीं ।
समेट लो खुद को फिर से तुम ,
कहीं फिर से बिखर न जाओ यहीं ।
जरा ओढ़ लो फिर से वही झूठी हंसी,
कि फिर मजाक न बन जाओ कहीं ।
नजर हटा भी लो आइनों से अब,
कि दूर जाकर जरा सम्भल जाओ कहीं।।

Thursday, 16 March 2017

होली हो नहीं पाई !!

होली तो हो ली लेकिन एक बात जो इस बार की होली में मैंने जानने की कोशिश की वो बात जान के लगा की होली तो हो नहीं पाई कुछ लोगों की .. बताते हैं किसकी नहीं हो पाई. होली में बहुत लोग मिलते हैं, बातें भी होती हैं और उन्हीं बातों से कुछ बात निकलती हैं, जो समाज के एक ऐसे सच को लाकर सामने खड़ा देती है जिसे हम सब जानते हैं बस उससे नजरें चुराकर घूमते हैं. शहरों में होने वाली बीहड़ होली के बारे में तो आपने सुना ही होगा वहीं गाँव में होने वाली होली के हुडदंग से भी वाकिफ होंगे . इन्हीं जगहों में बसने वाले सूरज, रोहित और मोहन चच्चा ने खूब होली खेली होली में सड़कों पर बेधडक घूमे, बालों में कोई मलिंगा वाले बाल लगाए कोई बड़ी सुनहरी टोपी लगाये तो कोई सिल्वर वाला केमिकल पोतकर घूमा. ये लोग बिना किसी डर के ही घूमेंगे होंगे न .. उन्हें ये डर नहीं था की भाई कोई घूरने लगेगा कोई अगली गली में उन्हें छेड़ देगा या सामने आता देख कोई शराबी उनसे बदतमीजी करने लगेगा .. उनको आता देख शराबी जो पूरी तरह नशे में डूबा है उन्हें आराम से जाने देगा भला कोई उन्हें क्यों छेड़ेगा .. टोलियों में घूमने वाले लडकों के ये झुण्ड बिलकुल वैसे घूमते हैं जैसे आजादी का हर हक़ उन्हें पैदा होते ही मिल गया था ..खैर आज़ादी तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ही .अब बात वो वाली जिसको हम सब कोई बात नहीं मानते. अब आप ही बताइए होली वाले दिन बाहर यानी सडकों चौराहों का माहौल खराब नहीं होता है .. लड़कियों के लिए ? अब किसी लड़की का घर के बाहर अपने दोस्तों के घर होली खेलने जाने का मन हो तो उसको आप क्या क्या समझायेंगे?
चलिए छोडिये नहीं जाती घूमने, मान  लीजिये की एक लड़की को होली खेले जाने वाले दिन यानी दुलहड़ी वाले दिन ऑफिस जाना पड़ जाये तो भी दिक्कत क्योंकि भैया हमारे तो गाने भी यही कहते हैं .. जो जी में आये आज कर लो जिसको चाहे इन बाहों में भर लो . अब गाने भी यही बज रहे हैं माहौल भी यही कह रहा है और हमारी तो परम्परा ही ऐसी रही है अब उस दिन गलती तो निकलने वाले लड़की की ही मानी जाएगी अगर उसकी कपडे फाड़ दिए जाए या और कुछ बड़ी घटना हो जाये तो.. क्यों ??
अब होली के दिन संस्कार और नारी सम्मान वाली बड़ी बड़ी बातें कौन करता है कोई उसूल याद रह जाता है .. सिग्नल पर तीन दोस्त बिना हेलमेट एक बाइक पर चढे लहराते हुए निकल जाते हैं . जल संरक्षण के बड़े बड़े निबंध लिखने वाला  गोलू छत की टंकी में रंग घोलकर बाल्टी बाल्टी पानी में रंग भर कर गली से निकलने वालों पर डालता जाता है. छत की खिड़की से झांकती रोली लड़कों के हुडदंग को देखकर खुश होती है और सोचती है की काश मैं भी ऐसे अपने दोस्तों के घर रंग खेलने जा पाती .. मौहल्ले की भाभी जिनको रंग बिलकुल पसंद नहीं है, उनकी आज पहली होली है ससुराल में तो देवर मिल कर रंग से भिगो देते है अभी कालेज जाने वाली भाभी रो देती है लेकिन देवरो को खुश देखकर मुस्कुरा देती है वैसे भी मौहलले के इन देवरो ने देवर का फ़रज आज पहली बार निभाया था. अब समझदार तो आप सब हैं ही तो अब जरा सोचियेगा कि रोली के बारे में और होली हो ली कि नहीं?? 

http://havabaazi.com/cafe-diary/holi-ho-naa-pai/


Tuesday, 14 February 2017

हौसलों के घरोंदे

हजारों किस्से लबों पर आकर रुक से जाते हैं,
दिलों के हाल कभी ख़बरों में नहीं आते !
कई बार टूटते  हैं हौसलों के ये घरोंदे ,
इन्हें हर बार मजबूत आसरे नहीं मिलते !

Wednesday, 1 February 2017

सबक

कभी रौशनी गुम हो सी जाती है ,
कभी आग सी अंदर ,
लग सी जाती है ।
उसूलों की सारी बात,
बेमानी सी लगती है ।
बात ईमान की अक्सर ,
चोट कर ही जाती है ।
बहुत सारे सबक हमने
मसीहों से सीखे थे ।
मगर ठोकर से जो सीखे ,
वो रट सी जाती है ।

पहचान

अग्निपथ पर ठहरा हुआ हो वक्त 
और मुस्कुरा दो तुम .... 
हो रास्ता सुनसान सा 
और शोर हो तुझ में  
अंधकार हो घनघोर सा 
और खुद को बुझा दो तुम
जलने की आरजू हो तुझमें
और अक्स को दफना दो तुम ।
जब पूछता हो हर मंजर 
है क्या पहचान तेरी 
अंधकार से संघर्ष में 
खुद को जला दो तुम ।।

Tuesday, 31 January 2017

तस्वीर

लफ्ज़ों की गर्म रजाई में कुछ ख्वाब समेटे रखते हैं ,
हम यादों की तकिया के नीचे तस्वीर छिपाये रखते हैं ।

नसीब

नसीब की बात होती है अश्क आंखो से गिर जाना,
नहीं तो अश्कों को भी छलकने का पता नहीं मिलता ।

अक्सर

तेरी खुशबू में खोकर अक्सर ,
खुद को भूल जाते हैं ।
ख्वाब टूटता है कांच जैसे ,
जब हम होश में आते हैं .

Monday, 30 January 2017

ज़िंदगी को दें नया वाला फ्लेवर



दोस्तों कैसे हैं आप? नव वर्ष की नई उमंग तो अभी होगी ही न और सर्दी में हौसलों की धूप भी खिलाये रहियेगा । सर्दियों के दिनों  की ठंडी सी सुबह में हम  देर तक कंबलों में घुसकर सपनों की दुनिया में खोये रहते हैं । उस वक्त भी कुछ लोग हमारे और आपकी बेहतर सुबह की बेहतर ज़िंदगी की तैयारी में लगे रहते हैं । आप उठते हैं और तुरंत आपका प्यार आपके साथ हो लेता है अरे वही जो अगर सुबह जगते ही न दिखे तो दिल जोर जोर से धड़कने लगता है ; आपका अपना स्मार्ट फोन । सारे नोटिफिकेशन और मैसेजेस चैक करके हम अपनी ज़िंदगी की भाग दौड़ में लग जाते हैं ।हमारी ज़िंदगी ,हमारा काम , हमारी सैलरी और हमारा आराम इन्हीं के बीच सुलझती उलझती है ये ज़िंदगी और चलती रहती है । सब कुछ याद रहता है हमें लेकिन भूल जाते हैं वो लोग जो बिना कुछ बोले लगातार हमारे लिए काम करते हैं । हर सुबह आपकी चाय से पहले अखबार को पहुँचाने वाले अंकल ,  घर के बाहर हमेशा मुस्तैद रहने वाले गार्ड भैया , आपके फैमिली जैसे बगल की दुकान वाले फूफाजी का हाल कितने दिन से नहीं पूछा आपने ? ज़िंदगी की तेज रफ्तार के गियर को थोड़ा नीचे करके , पकड़ लीजिए इन अनमोल लोगों के रिश्तों की नाजुक होती डोर को टूटने से पहले। फिर देखिएगा कैसे आपकी बोरिंग सी होने वाली  सुबह शाम कितनी खूबसूरत हो जायेगी । तब आप सोशल मीडिया पर सड़ा सा मूड होते हुए भी स्माइल वाला रिएक्शन नहीं दे रहे होंगे बल्कि चंद जिंदादिल लोगों की ज़िंदगी के किस्सों को सुनकर ठहाके मार रहे होंगे । इस नये साल में ज़िंदगी को यह नया वाला फ्लेवर देकर देखिएगा और फिर बताइयेगा अपना अनुभव ।

तेरी याद नहीं आती ..

जिद्दी सी यादों के दलीचे पर ,
खामोश बैठे रहते हैं ।
कभी हवा के झोंको पर हम,
तेरी महक को ढूंढा करते हैं ,
हम तुम्हे याद कहां करते हैं ...।
हर पल हर आहट पर ,
हम तेरी आहट को तरसा करते हैं ।
चौकते हैं , सिसकते हैं ,
कभी खुद पर मुस्कुराया करते हैं ।
हम तुम्हे याद कहां करते हैं ।
तुम बार बार पूछते हो
मेरी याद नहीं आती ?
हम हज़ार बार कहते हैं ,
मशरूफियत नहीं जाती ।
कभी मशरूफियत में भी ,
मुझे छेड़ा करती हैं
तेरी ये यादें बेवजह ही आती हैं ।
मैं नसीब की चादर में तुझे ढूंढ़ती ही रहती हूँ
तुम्हारी हर वफ़ा मुझको हदों के पार मिलती है ।
कभी उसूलों से पार रास्ते में
मुझे आकर के तुम मिलना
फिर पूछ मत लेना
क्या मेरी याद आती है ?

ग़ज़ल

तेरी हर जुबानी पर शायरी लिख दूँ मैं,
तू रूह में यूँ बस जा कि तुम्हे मैं लिख दूँ मैं ।
कभी सांसों में यूँ ठहर कि
 सदियों में न बीते ऐसा पल लिख दूँ मैं।
ये आहटे ये चाहते ये तन्हापन की उलझनें
तू मुझे कुछ यूँ उलझा दे खुद में
कि सुलझन लिख दूँ मैं ।
कभी दिल के दरिया में बरसात बन कर मुझसे मिल
कभी ये दिल बारिश बन जाये तुझे प्यास लिख दूँ मैं ।
मेरे वजूद की हर हद बिखर जाये कहीं तुझमें
तू अपनी हद में मुझको पनाह देगी लिख दूँ मैं ।
मेरे सब्र की हर सांस टूट जाये
तू आके मिल यूँ मुझसे की थोड़ा जी लूँ फिर से मैं ।
तुझे वो आस लिख दूँ मैं ।
मेरे अश्कों की साँस के टूटने से पहले आ
कभी खत्म नहीं हो जो तुझे वो इंतज़ार लिख दूँ मैं।
मेरा वजूद आइने में मुझे झूठा नज़र आये
तेरी आँखों के सीसे में मेरा ये जिस्म दिख जाये
जो मेरी रूह तक पहुंचे तुझे वो जज़्बात लिख दूँ मैं ।
तू मेरे करीब आ इतना तेरा हर लफ्ज पढ़ लूँ मैं
जिस्म से रूह तक छू ले तुझे ग़ज़ल लिख दूँ मैं ।

मुर्दा ख्वाबों का अफसोस

मुर्दा ख्वाबों का अफसोस लिये फिरते हो ,
तुम जीते हो ज़िंदगी .....
या ज़िदगी का बोझ लिए फिरते हो ?
हर वक्त मुस्कुराहटों की धूप सी खिली रहती है ,
या दिलों में जलते हुए ज़ज्बात लिये फिरते हो ।
उम्मीद की हर लिखावट तुम खुद ही लिखते हो ,
या नाकामियों से मुंह मोड़ के 
ऐसी बातें बार बार किया करते हो ।
इस कदर हंसते जाने कि कुछ तो होगी वजह ,
कहो कितने अश्कों का उधार लिये फिरते हो ?
तुम जीते हो ज़िंदगी .....
या ज़िदगी का बोझ लिए फिरते हो ?
कहीं उधारी की मांगी हुई लगती है ,
मुस्कुराहटों की जो दीवार बनाये रखते हो ।
एहसासों, ज़ज्बातों को समेट कर, 
बिखरे ख्वाबों,उम्मीदों को बना भी लो साथी ,
क्यों ज़िंदगी तन्हा उदास जिया करते हो ?
तुम जीते हो ज़िंदगी .....
या ज़िदगी का बोझ लिए फिरते हो ?