मुर्दा ख्वाबों का अफसोस लिये फिरते हो ,
तुम जीते हो ज़िंदगी .....
या ज़िदगी का बोझ लिए फिरते हो ?
हर वक्त मुस्कुराहटों की धूप सी खिली रहती है ,
या दिलों में जलते हुए ज़ज्बात लिये फिरते हो ।
उम्मीद की हर लिखावट तुम खुद ही लिखते हो ,
या नाकामियों से मुंह मोड़ के
ऐसी बातें बार बार किया करते हो ।
इस कदर हंसते जाने कि कुछ तो होगी वजह ,
कहो कितने अश्कों का उधार लिये फिरते हो ?
तुम जीते हो ज़िंदगी .....
या ज़िदगी का बोझ लिए फिरते हो ?
कहीं उधारी की मांगी हुई लगती है ,
मुस्कुराहटों की जो दीवार बनाये रखते हो ।
एहसासों, ज़ज्बातों को समेट कर,
बिखरे ख्वाबों,उम्मीदों को बना भी लो साथी ,
क्यों ज़िंदगी तन्हा उदास जिया करते हो ?
तुम जीते हो ज़िंदगी .....
या ज़िदगी का बोझ लिए फिरते हो ?
its touching di....sonali
ReplyDeletethankuu dear
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